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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-25

संतो सिंवरो सिरजणहार, जम्भेश्वर जीवां धणी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

दई जूं देह, कहो पार कुण पावे

जांकी कला अनेक जीव कहो कहां जस गावे

जा जन लग महकार, श्रीखण्ड जिम आवे

किस्तुरी से अधिक, वास परमल महकावे

साधा मन आनन्द अति, आये हु जम्भ अचम्भ

लूणकरण कहे कर सिर धरो, दया धर्म के थम्भ

संतो सिंवरो सिरजणहार, जम्भेश्वर जीवां धणी

दुःख मेटण दातार, भव भंजन जिभिया भणी

भव भंजन जिभिया भणी नैं, अलख शिंभू आप

दया कर गुरु दुःख मेटे, करे परलय पाप

कोड़ बारां कारणै, कलि आयो इण काम

स्वांस स्वांस अरदास कीजे, सिंवरियो गुरु श्याम

जम्भेश्वर जीवां धणी ( १ )

जुग जाग्यो जगदीश, काय धारि आयो कले

स्वर्ग देवण सुरराय, साचो गुरु संभरथले

संभरथले गुरु श्याम आयो, पात परसैं पाय

साधां गुरु सांचो मिल्यो, स्वर्ग देवण सुरराय

कहर क्रोध कुबाण काप, परहरो उर रीस

साच शील सुचाल चालो, जुग जाग्यो जगदीश

काया धारि आयो कले ( २ )

सार हुई संसार, सतगुरु आयो सांभल्यो

इला लियो अवतार, मोहन मानवियां मिल्यो

मोहन मानवियां मिल्यो नैं, सही विसवा विस

साध पूगी श्याम आयो, तारसी तेतीस

आपणां अपणाय लेसी, पापियां पासै टालिया

इक टंगिया आय ने, परम पांव जे लागिया

सतगुरु आये सांभल्यो ( ३ )

सही स्वर्ग दे श्याम, शुचियारां साचो धणी

परहर पाप विकार, सीख स्वर्ग की जो सुणी

सीख स्वर्ग की जो सुणी नैं, उर मेटियो अभिमान

प्रीत कुल की परहरो थे, संभल्यो गुरु ज्ञान

अजर जर मन मेर छाडो, दया कर दाखै दई

कह ‘केशो करो क्रिया, स्वर्ग सुख पावो सही

शुचियारां साचो धणी ( ४ )