साखी-26
साधो विष्णु विष्णु भणंत, जुगतारण जीवां धणी
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
एक मथुरा को सेठ, एक वन खण्ड को तापसी ।
सती करै नित सेव नार मुख बोले आतसी ।
विष दियो बेकाज एक बात आय लागी टांणै ।
मनसा वाचा कर्मणा, ताको परमेसर जाणै ।
विकस्यो कंत करक्षा नारी ओगुण कियो अकाज में ।
देही दुःख दुणो दियो बाकी रोवे ब्याज में ।
साधो विष्णु विष्णु भणंत, जुगतारण जीवां धणी
कृष्ण सही करतार, हरि हरि जपो हे दुनी
हिर हरि जपो है दुनि नैं, संकट मांहि सहाय
प्रहलाद विरियां तुरत आयो, फंद काट्यो आय
परमेश्वर पूरो धाणी, मिल्यो मया कर मिंत
श्याम को दीदार दीसै, विष्णु विष्णु भणंत
जुगतारण जीवां धणी ( १ )
जंभ गुरु जगदीश, मन सूधो मन धावणां
पालक देत दिवाण, गुरु का शब्द सुहावणां
गुरु का शब्द सुहावणां नैं, सकल को आधार
मोहनी सी मूरति सकल शोभा, श्याम सिरजणहार
गोविंद गिरधार नाम पर हर, अन्तर्जामी ईश
रणछोड़ राघो अमर केशव, जंभ गुरु जगदीश
मन सूधो मन धावणां ( २ )
लक्ष्मण राजा राम, परस परम गुरु पेखिये
कान्ह कुंवर नंदलाल, सिरजणहारो देखिये
देखिये नैं पतिशाह पूरों, कच्छ कोरंभ तूं धाणी
मच्छमहपति मलणमलेक्ष, मले बुधा बावन रामाधाणी
जगत मंडन ओर खंडन, मांहि चतुर्भूज देखिये
लक्ष्मण राजा राम, परस परम गुरु पेखिये
सतगुरु सन्मुख लेखिये ( ३ )
नारायण निज नाम, जपिये तो सुख पाविये
त्रिकम तिलक तियार, गुण गोविंद का गाविये
गुण गोविंद का गाविये नैं, श्रीलाल गोपाल
चवदे भवण को राजवी, निष्कलंक दीनदयाल
जगन्नाथ राधिका कोड कीजे, द्वारका सुधाम
मढ़ी पालकी महल कीयो, नारायण निज नाम
जपिये तो सुख पाविये ( ४ )
नरसिंह नर मुलतान, म्लेछ मलणनै आविया
साधां करण संभाल, रिण मंझ साधा उबारिया
रिण मंझ साध उबारिया नैं, सारिया सब काज
देव तूठां मुक्ति लाभै, जाण तूठा राज
दास ‘दामों’ शरण थारी, रथ आयो देवाण
पोहप में प्रकाश कीयो, नरसिंह नर मुलतान
भूधर भगतां संग रमें ( ५ )