मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह202 / 157
प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-27

मन सो बुरो न कोय, शिवशंकर संतापिया

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

एक हत्या को पाप एक आय लागी अमावस।

हथणी सूंग या हाथ सूंड ने कियो तपावस।।

एक ने रा यो संतोष तिन वित खूटी मुवा।

जों कुछ किया सो बुरा बुरा न तिन्ही का हुवा।

भले बुरे को पहन्तरो कहो किण आगे कूकसी।

पाप मती कर प्राणियां, आखिर तो दिन उगसी।

मन सो बुरो न कोय, शिवशंकर संतापिया

पारवती पति खोय, धियान अटारन थापिया

धियान अटारन थापिया नैं, महा बलि मन राय

नाचण लागो डोकरो नैं, कर सूं ताली लाय

थुंगिदन थुंगिदन ओचरै, लाग रही धानु सोय

ईश्वर देव नचाविया, मन सो बुरो न कोय

शिवशंकर संतापिया (१)

मन बोयो बूबकसाह, लाग रहे मन मोतियां

गयो समंदां तीर, माल भरो ले कोथलां

माल भरो ले कोथलां नैं, मुक्ता मोती हीर

अरथ मुरादै डोकरो, मन में पायो धीर

नारी आई काज कर नैं, ओ बड़ बैठो मांह

गल सूं बांधाा कोथला, मन बोयो बूबकसाह

लाग रहे मन मोतियां (२)

रथ पर बैठी नारि, मंत्र पढै चूड़ामणी

नारी करैं विचार, पोहर एक में जावणो

पोहर एक में जावणो नैं, घणी बिच में दूर

आज लाज कैसें रहै, सही जे ऊगे सूर

रथ भारी हाले नहीं नैं, नारी करै विचार

रथ छिटकायो समंद में, डूब'र मरो गंवार

मंत्र पढै चूड़मणी (३)

मन जाणै सब बात, जाणत ही कावल खड़ै

कदे नहीं कुशलात, कर दीपक कूवे पड़ै

कर दीपक कूवे पड़ै नैं, गिणै नहीं परवार

भाइयां सूं भूंडी करै, मन मतिहीन गंवार

आदि अन्त को चुगलियो, माय बहण लग घात

ओ गुजरै नहीं बाप सूं, मन जाणे सब बात

जाणत ही कावल खड़ै (४)

मन का मता अनेक, क्या जाणै जीव बापड़ो

महा मस्त मन एक, सब सिर थापै थापड़ो

सब सिर थापै थापड़ो नै, बापड़ो संसार

सुर नर मुनिजन देवता, सबको करै सिंघार

महा मस्त मानै नहीं, कही न छाडै टेक

जन 'हरजी' ऐसी कही, मन का मता अनेक

क्यां जाणे जीव बापड़ो (५)