साखी-28
मन को बुरो स्भाव, इसके मतै न चालिये
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श्री जम्भेश्वर धाम, जाग जो जग ??? जो खावै
पाप मिटै पल मांय, जहां जाम हाथ न लावै
लगै चोट धरम डंड, जम डंड देण न पावै
होम करै कर हेत, शब्द जम्भेश्वर का गावै
माटी काढै प्रेम सूं, जन्म मरण भव दु:ख मिटै
श्री जंभ धाम को परसतां, कर्म जूण क्षण में कटै
मन को बुरो स्भाव, इसके मतै न चालिये
ये जाणै बहुत उपाव, अनेक जतन कर पालिये
अनेक जतन कर पालिये नैं, झालिये गहि बांहि
बाहर जातो आणिये नैं, काया गढ के मांहि
दश दिश चोकी राखिये नैं, दुष्टी जाणै दाव
निकस जावै पवन ज्यूं, मन को बुरो स्भाव
इसके मतै न चालिये (१)
एक श्रृंगी रिषराज, तप करंतो माहबली
मन दीन्ही सिर मांय, मोहनी रूप लियो छली
मोहनी रूप लियो छली नैं, कियो अंत आधीन
गह आयो ले गांव में, दर्शन दुनियां दीन
सेवा स्मरण हरिकथा, भूलि गयो रिषराज
रातो सुख संसार में, एक श्रृंगी रिषराज
तप करंतो महाबली (२)
सुण मन का उपकार, रावण सूं रगड़ा करी
छेद्या लक्ष्मण कुंवार, दश मस्तक लंकेशरी
दश मस्तक लंकेशरी नैं, छिण में दियो गुड़ाय
मन का मारा मर गयो, महाबली अणराय
रावण असुरां राजवी, लंका तणो दरबार
रूठो रावण राम सूं, सुण मन का उपकार
रावण सूं रगड़ा करी (३)
मन के बहुत मरोड़, जाय रूठो इंद्र आप सूं
तिरिया चौंसठ किरोड़, फंसियो गोतम वाम सूं
फंसिया गोतम वाम सूं नैं, फंस'र लियो सराप
छांटो लाग्यो सुरपति, अजहुं अजोलग पाप
मन अणहोणी करै, गिणै न ठौर कुठौर
मन सूं कदी न धीजिये, मन के बहुत मरोड़
जाय रूठो इंद्र आप सूं (४)
मन की क्या परतीत, ब्रह्म देव सूं ना टल्यो
लियो जगत गुरु जीत, रूप मोहणी कर छल्यो
रूप मोहणी कर छल्यो नैं, सही बिसवा बीस
सगी पुत्रे सरस्वती, होय दियो दुरशीस
सुर नर मुनिजन देवता, सकल भया भयभीत
जन 'हरजी' की वीणती, मन की क्या परतीत
ब्रह्म देव सूं ना टल्यो (५)