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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-23

परम भगत प्रहलाद, हिरणाकुश दुख ही दियो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

सतजुग अन्त के मांय, भयो हिरणाकुस पापी ।

(सुकृत) सुकता किया बन्द, अवनि त्राह कर कांपी ।

धार सुरह को रूप, अरज करी हरि ठारे ।

प्रभू थारो अवतार, मैं शरणागत थारै ।

एवमस्तु वर दियो, अवनि कूं विदाह (विदाई) करी ।

विष्णु रूप पलटकर, दूसर धारयो नरहरि ।

परम भगत प्रहलाद, हिरणाकुश दुख ही दियो

घोल हलाहल जहर, उण पायो इण पी लियो

उण पायो इण पी लियो नैं, महा विष्णु के नाम

मुलतान मेलो मंडयो नैं, देखे सारो गाम

दैतां कुल अचरज भयो, मारयो मरै न बाल

हिरणाकुश हिरदे डरे, आय गयो मुझ काल

पुत्र नहीं कोई देव है ( १ )

फोजां लई बुलाय, मार मार मुख ओचरे

तोपां दई झुकाया, ओलां ज्यूं गोला पड़ै

ओलां ज्यूं गोला पड़ै नैं, तीर तुपक तलवार

परसी पर घर मर गला, मुग्दर करेजुं बहुती मार

छुरी कटारी गुप्ती चालै, लागे नहीं लिगार

हरि भगतां रे संग ??? रमें, जानें नहीं गिंवार

जाकै साची टेव है ( २ )

मरै नहीं प्रहलाद, हिरणाकुश हृदय डरै

गई भूख अरु प्यास, रात दिन सांसो करै

रात दिन सांसो करै नैं, कोट चिण्यो कर रीस

क्रोड़ साध किया कैद में, तीनां ऊपर तीस

सो जोजन ऊंचो चिण्यो, अन जल कबहु न दीस

रवि द्वादश गढ कांगरा, तपे जुं बिस्वा बीस

जाने नहीं तां भेव है ( ३ )

हरि रा आडा हाथ, बादल नित वर्षा करे

छपपन भोग तैयार, रिद्धि-सिद्धि साथे फिरे

रिद्धि-सिद्धि साथे फिरे नैं, मेवा लियां मिष्ठान

अन्न इच्छा लेवे नहीं, पण देव करे गुणगान

कुलफ खोय देखें दुष्ट, तब बीते बारां मास

सन्तां रे सुख अनन्त हैं, देख अरु भयो उदास

सिद्धि करे सब देव है ( ४ )

खड़ग लियो उन हाथ, पांच करोड़ परलय कऱ्या

पकड़ लियो प्रहलाद, संत सकल मन में डरया

संत सकल मन में डरया नैं, भागा आठ रू बीस

कंठ पकड़यो प्रहलाद को, कहां तेरो जगदीश

मौ तौ खड़ग खंभ के मांहि, तब निकल्यो भभकार

पकड़ पिछाड़यो चौक में, जाणै सब संसार

‘साहब’ सतगुरु सेव है ( ५ )