साखी-22
बाबो आवियो आदि विष्णु संभरथल साचो धणी
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सवैया
लगी नाँव से प्रीत चित मोहे और न आवे।
क्या बके वकबाद बावरा क्या जो सुनावे।
हरी रंग लागो मोय अब रंग और न लागे।
जिन पियों पियूस प्यास नही ईमरत आगे
रत मतवारा बावरा मिथ्या वाद न भाव ही।
प्रहलाद कह सुन पांडिया निश दिन हरी गुण गावही। ८।
बाबो आवियो आदि विष्णु संभरथल साचो धणी
प्रच्या पवण छतीस, सप्तदीप सोभा सुणी
सपतदीप सोभा सुणी नैं, आवियो हरि आप
खुध्या तिसना नींद नांही, सोक न सन्ताप
छायां खोज न आपदा नैं, कलु आवियो कृष्ण
किरतार पार पावै कवण, आवियो आदि विष्ण
संभरथल साचो धणी (१)
सर्व धर्म संसारि, प्रगट किया परम गुरु
पाप धर्ा नवेड़, न्यारा किया सुगर गुरु
न्यारा किया सुगर गुरु नैं, साच शील सनान
कारण किरिया होम जप तप, सुपह सुमारग दान
आन भ्रम कुथान, अतरा सर्वस निवार
विष्णु जाप रु विष्णु पूजा, सर्व धर्म संसार
प्रगट किया परम गुरु (२)
सिकंदर बाबर बादशाह, पठाण चगथा परचिया
सांगा राणा चित्तौड़, रायसल वरसल सिसोदिया
रायसल वरसल सिसोदिया नैं, दूदो सांतिल राव
बीको बीदो हमीर बाघो, जोधा द्वादश जाव
जेसाण रावल जेतसिंह, अजमेर कर्णसिंह पंवार
महमंदखां हाखमखां शेखसदो,सिकंदर बाबरबादशाह
पठाण चगथा परचिया (३)
और परच्या केइ अपार यां रा, सुत नाति दोहितरा
जेइ जेइ उत्तम जीव, सतगुरु का सेवक खरा
सतगुरु का सेवक खरा नैं, सदा श्याम सिहायि
विष्णु सहसि वंश बधासि, पाप वंश क्षे जायि
गिण राजवी ज्ञान मांहि, प्रजा न लहहुं पार
नवखंड देश रा नरपति, और प्रच्या केइ अपार
सुत नाति दोहितरा (४)
दरसण परसण देव, करणी चालै गुरु कही
साचा साचो श्याम, सतगुरु जहां साथे सही
सतगुरु जहां साथे सही नैं, मोख पाव मनसवा
अमी कचोले भोग मनसा, सदा आनंद नित नवा
हिंडोल हिंडण पिलंग पोढण, सरस मनसा सेव
'परमाणंद' गावै मुक्ति पावै, दरसण परसण देव
करणी चालै गुरु कही (५)