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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-21

राग धनाश्री

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

दूदो मेड़तियो राव, आय गुरू पाय विलग्यो

रावल जैसलमेर परचया सांसो भाग्यो

सामलि सन्मुख आय सुचील जित हुओ सिनांनी।

सांग राण सुणि सीख, जका गुर कहीस मानी।

छव राजिन्द्र के के अवर, आचारे ओलखियो

वील्ह कहै मांगी पुन्ह, जहां मुकति ने हाथी दियो।।

राग धनाश्री

बाबो आपे उपना आप, मछ संखासुर मारियो

कछ रूपी कीचक, वाराह मुर दत सिंघारियो

वाराह मुर दत सिंघारियो नैं, नरसिंह हिरणांक

बावन बल परसराम अर्जुन, राम लक्ष्मण लंक

कन्हड़ कंस र बुध गयासुर, जपायो विष्णु जाप

असुर उथप्या सुर थप्या, बाबो आपे उपना आप

मछ संखा सुर मारियो (१)

पहलाद कह्यो परगट, देव विष्णु वाचा दई

तेता हरचंद साथि, सात कोड़ सिधा सही

सात कोड़ सिधा सही नैं, नवैं युधिष्ठिर राय

पांच सात नव तिहूं जुगे, हुवो विष्ण सहाय

लालच लोभ चोरी ठगाई, कलिजुगे कूड़ कपट

कोड़ बारां तारणै, पहलाद कह्यो प्रगट

देव विष्णु वाचा दई (२)

कथि सुणी किरतार, भगतां पति बुधर भणी

आप लियो अवतार, धार ऊपर जीवां धाणी

धार ऊपर जीवां धाणी नैं, बाल चिरत अपार

काचै करवै नीर राख्यो, जोसी मानी हार

दीवा सजल जगाविया, बाल चिरत अपार

अनेक स्याणां हार चाल्या, कथि सुणी किरतार

भगतां पति बुधर भणी (३)

हुक्म चरावै पाल, हुक्में पाणी पीजिये

बालां संग जग आप, कहियो बालां कीजिये

कहियो बालां कीजिये नैं, कियो खेल किरतार

लोहटजी नै चरितर दिखायो, मेह अखंड धार

खेत निपायो सांहझ पेहलुं, उधारण प्रचो सार

दूदैनै गढ मेड़तो, हुक्म चरावै पाल

हुक्में पाणी पीजिये (४)

प्रगट कियो पंथ, बयांले मां अन्न आप्यो

बंयालै कातिक मास, थिर नामी कलश थाप्यो

थिर नामी कलश थाप्यो नैं, प्रच्या सुरग देख

पेहलि पुहल प्रचियो, ओलख्यो अलेख

ज्यूं महि मांहि घृत काढयो, श्रव मारग मंथ

परमाणंद पूरै धणी, प्रगट कियो पंथ

च्यार चक प्रचाविया (५)