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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-20

नारायण नाम अनंत, अनंत अवतार ज्यूं धियाइये

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

जंभ गुरू सो देव न कोई सुण्यौं न देख्यौ।

घ्रत धूप मिस्टान होम कर नित प्रति पेख्यौ।

करै विष्णु उपदेस लेश जिव पाप न राखै।

सब दुनियां सू हेत खेत मुक्ति मुख भाखै।।

आन देव किए दूर सब कहै मुखां हरि सेव।

लूणकरण राजा कहै, नमो नमो गुर देव।।

नारायण नाम अनंत, अनंत अवतार ज्यूं धियाइये

कीर्ति अनंत अपार, प्रेम प्रीत सुं गाइये

प्रेम प्रीत सुं गाइये नैं, राख उर प्रतीत

लोक लाज सब परहरो नैं, छाड़ कुल की रीत

तन मन दीजै प्रीत कीजे, सिंवरियो भगवंत

महिमा श्री महाराज की, यों नारायण नाम अनंत

अनंत अवतार ज्यूं धियाइये (१)

साधो धर धर रूप अनेक, संता रा कारज सारिया

मच्छ कच्छ वाराह व्यास, नरसिंघ बावन धारिया

नरसिंघ बावन धारे अनंत, हंस हय ग्रीव जान

बदरी पति दत्त कपिल मुनि, सनकादि पृथु मान

राम रिषभ परशु कन्हड़, बुध कलकी देख

यज्ञ ध्रुव अर हरि प्रगटे, धर धर रूप अनेक

संता रा कारज सारिया (२)

केशो कृष्ण करतार, गोविंद गिरधर गाइये

कमल नैन कृपाल, चरण चतुर्भुज ध्याइये

चरण चतुर्भुज ध्याइये नैं, मोहन मन में धार

गोपाल दामोदर मुकुन्द माधाव, सिंवर सृजणहार

नाम नरहरि अंतर्यामी, हिरदे विष्णु रहाय

अलख अयोनि ब्रह्म शंभू, केशो कृष्ण करतार

गोविंद गिरधार गाइये (३)

अनंत कला सुं आप, पूर्ण ब्रह्म पधारिया

अंस कला अवतार, बहु बिध कारज सारिया

बहु बिध कारज सारिया नैं, नेम नित अवतार

आप जंभ गुरु आविया, प्रहलाद वाचा धार

कह 'उदो' सुणो साधो, जपो हरि को जाप

भक्त वत्सल भगवंत खेले, अनंत कला सुं आप

पूर्ण ब्रह्म पधारिया (४)