मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह312 / 157
प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी

साखी-137 धड़ाबंध चोहजुग की

नवण करूं गुरु जंभनै, निऊं निर्मल भाय

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

नवण करूं गुरु जंभनै, निऊं निर्मल भाय

कर जोड़े बंदू चरण, शीश नवाय नवाय।

धड़ाबंध चोहजुग को, वरणूं दस अवतार

सतगुरु सुध भाखियो, सुणियो संत विचार।

सत्रा लाख सतजुग हुवो, अरु अठाईस हजार

तेहि जुग नर परगट हुवो, वेद गिणत अवतार।

मछ कोरंभ वराह भणै, नरसिंह नर नाहर

गुरु प्रहलादा परठयो, दृढि मन करणी सार।

पांच करोड़ी पोह कियो, कुपहा दोरे जाय

दया धर्म बाहरो, जीव तिरै बो नाय।

दान शील तप भावना, चौह जुग धर्म विचार

दया धर्म सूं बाहरो, अफल गया संसार।

सतजुग बरत्यो भाईयो, दूजै जुग विचार

बारह लाखा तेत्ता हुवो, और छिनवें हजार।

तिहिं जुग नर परगट हुवो, ईश्वर नियम गिणंत

बावन प्रसराम लक्ष्मण, रिण रावण छिदंत।

जुध हुवो नर बंदरा, सीता कारण लंक

असुर खप्या सुर ऊधरया, सांम सदा निकलंक।

गुरु हरिचंद परठयो, जिहिं तारादे नार

पुत्र सहित काशी बिक्यो, सतनै बैठो हार।

सात करोड़ पोह कियो, कुपहा दोरे जाय

दया धर्म बाहरो, जीव तिरै बो नाय।

तेत्ता बरत्यो भाइयो, तीजै जुग विचार

आठ लाख द्वापर हुवो, और चौसठ हजार।

द्वापुर जुग नर परगट हुवो, सो शक्ति सारंत

गोवल कन्हड़ बुध बल, असुरां संघारंत।

जांहि नरां गुरु ओलख्यो, दया धर्म को भेव

केवल सूं परचो हुवो, ताहिं पिछाणयो देव।

प्रचो लाधो पांडवै, परहर पाप विकार

गुरु युधिष्ठर परठयो, दृढ मन करणी सार।

नव करोड़ी पोह कियो, कुपहा दोरे जाय

दया धर्म बाहरो, जीव तिरै बो नाय।

द्वापुर बरत्यो भाइयो, चौथे जुग विचार

चार लाख कलि जुग हुवो, और बत्तीस हजार।

अबकै बारी तारण के, जीव ज राता तंत

नर निर्मल निष्कलंक नर, ले ले नाम भणंत।

नवां पहलि आदि जो, ऐता हि गिणियंत

गुरु सतगुरु वाचा चवण, विष्णु विष्णु भणंत।

जुग चौथे नर प्रगटयो, असत न भाख्यो जाण

सहजे गुरु न ओलख्यो, भवंसि अनन्त भवाण।

तारेवो छै बारां को, ओरे अनंत नरांह

पूछै पोह लाधो नहीं, कुपहा दोरे जाय।

जुग चौथे भाइयो, भोलावो दुनियांह

कुड़ो गुरु परमोधसी, ठगसी नारी नरांह।

लेय करद गल काटसी, हत करसी हेरांन

कहिंसि फुरमाया करै, कहीं भुलावै अज्ञान।

गिणसी गुरु वंशावली, मोहे मन अवरांह

स्वर्गे लेखो मांगसी, पड़सी घणी दरांह।

सतगुरु बिन जाणै नहीं, चहुं धरम को भेव

कुगुरू चेलो बूडसी, दया विहूंणा हेव।

कलिजुग कलह घणी, कही संभलाऊं साध

जासुं कहीजै हेत सूं, सोई चलावे बाद।

ज्ञान कसाई पण कथसी, हतसी गऊ असंख्य

अभिमानी गऊ मारत डरे नहीं, रती न मानै संक।

जेहिं गुरां जाण्या नहीं, अदया दया विचार

ताहिं भरोसो बापड़ा, वोह जुग बुडसि गिंवार।

आप बहा बहि गया, खोज्यो नहीं तंत

अभिमानी अहंकार मां, केता गया गडंत।

कलि धुतारा आयसि, दुनियां करसी मोह

झुंठन से ठुबलहा, फिर फिर सोधै खोह।

प्रचो करसी पाप सूं, प्रबुध करसी पीर

ओलो लेव अवतार को, सकते मांडै सीर।

खुणो जमलो मांडसी, छाना करिसी छेद

अजाणी जाणै नहीं, सतपंथ को भेद।

खिरि रूही एको गिणै, भुलाया कुगुरांह

ऐसा अकारण बरतसी, कलजुग लागतांह।

ज्ञान विहुंणा गुरु करे, प्रचै बिन पुजाहिं

मति हीणा मन हठ करै, मन मुख दान दिवाहिं।

गुरु आखर न पिछाणहीं, शब्द न सुणहिं कान

राह छोड़ बेराह पड़िया, छल लिया सेतान।

थल माथै निवांण करै, नर कांय लोड़ै नीर

नाले खोले ना मिले, रेणायर बिन हीर।

कंचन कर संगरह, निश्चय हुआ भंगार

अपरख बंधे था गंठड़ि, ते फिटा संसार।

कालर बीज न नीपजै, सूकै ठूंठ न फूल

केवल ज्ञान बाहरो, कूड़ा गुरांनै भूल।

अन बिन तिरपत न आतमा, संत बिन नहीं सुसंग

नीर पखो नेपै नहीं, गुरु बिन मुक्ति न मंग।

जो गुरु आप स्वार्थीं, परमारथ न करंत

चेले किणपर तारसी, जो आपहि बूडंत।

सुगुरु कुगुरु को पारिखो, पायो गुरु परसादि

अवचल वाच अभूल गुरु, लेखो अन्ति न आदि।

सतपंथ हुतैं पंतरया, पतराया कुगुरेह

भूला कुड़े कागले, मन मोह्या मुकुरेह।

गुरु सतगुरु जाणै नहीं, गुरु थाप्या अजाण

ताहिं कुगुरां तणी कुसीखड़ो, भागि गुरु की आण।

काहिं पत्थर पुजियां, काहिं गले बंध्या तूर

काहिं औसर घातिया, काहिं अरघ सूर।

काहिं मुकुट सिर बंधिया, काहिं मुदरा कान

काउं बाउं होय सै, गुरु भुलाणा निदान।

दणीयर दीप दोह दिशा, अलुझाया अंधियार

सतगुरु आयो सांप्रति, बूझे नहीं गिंवार।

हीरा परखे जौहरी, सुरतहिं निज ही होय

सुधि सराफि बाहरो, पारिख लहै न कोय।

विणजै काच विलंगिरी, कणिजां कंकण लख

सेक्यूं जाणै बापड़ा, हीरा तणी परख।

अमी भोलावै विष पीवै, जिवड़े होय जियान

केवल ज्ञानि बाहरो, कूड़ो कथै गियान।

पंदरासै अठोत्तरै, गुरु आयो करि भाव

कुपरि पलटण परिकरण, थापण नीति न्याव।

जंबूद्वीप अरु भरतखंडे, सभरथल प्रकाश

आयो बारां कारणै, कोड़यां पूरण आस।

चौथे पंथ मांहि जोगपुर, जुगतै जुगति मिलाय

सतजुग की परिवापरि, कूड़ कलजुग मांय।

जेंहि पर आयो जगतगुरु, सापरि कहूं विचार

वील्ह कहे औतार को, प्रचो आलिंकार।