साखी-138
भणो गुणो गुणवंतो देव, ज्यांरा गुणा न लाभै छेव।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
भणो गुणो गुणवंतो देव, ज्यांरा गुणा न लाभै छेव।
ज्ञान मन राखो इकतार, पाप धर्म रा सुणो विचार।
ल्यैहैं अकोड़ करै अन्याव, चोरी चुगली सूं घणो हियाव।
बांने परख र हांढै लार, ताता खंभां रे गल मार।
बहन भाणजियां रो लेवै भाड़ि, दौरै मांहि पड़ैलो धाड़ि।
वस्तु पराई पड़ी लहांय, दाबि रहे मला मन मांय।
पूछी न कहै दिल रा चोर, गुरजां तणी सहैला ठोर।
मुरड़ मजूरी राखे ताण, किरिया मांहि पड़ैली हाण।
रूंखा तणी न पालै दया, बाढै बनी कुंभी भया।
अणछाण्यो पाणी बरताय, जीवांनै वै घातै जाय।
धांधा धुल रहै अचेत, तां पापां ते हुवै परेत।
सुभ्यागतां न मेलै तार, थुलां सरसा हुवै खवार।
जाति जेण री करै न काण, पापी पाप कुमावै जाण।
घासा मोस चालै घणो, ते दुख सहसी दौरे तणो।
धांधा धुल चालै घणो, रूड़ा न टालै रूत आ भींटाणो।
रल खोटा रल्यां पीछै छिड़ै, इण विध घर सगलो आ भिड़े।
जूंवा लीखां करै सिंघार, नागड़ दूत देवैला मार।
सीख दियां बोलै कड़कड़ी, दौरे दुख सहसी बापड़ी।
सुणियो ज्ञान न करियो रीस, सतगुरु कह्यो बिसवा बीस।
करो कमाई न करो ढील, गुरु फरमाया पालो सील।
शब्द विचार बोले वील्हा, स्वर्गे जाय करो यह लीला।