कवि परिचय — ऊदोजी नैण
जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।
नारायण नांव अनन्तो, अनन्त अवतार ज्यूं ध्याइये । कीर्ति अनन्त अपार, प्रेम प्रीत सूं गाइये । प्रेम प्रीत सूं गाइये नै, राख उर प्रतीत । लोक लाज सब पर हरो नै, छाड़े कुल की रीत । तन मन दीजै प्रीत कीजै, सिंवरिये भगवंत । महिमा श्री महाराज की, यो नारायण नाम अनन्त । अनंत अवतार जूं ध्याइये ।१।
नार-आयन अर्थात् जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु के अनन्त नाम तथा अवतार हुए है। इसी भावना से ही विष्णु का ध्यान स्मरण करें। भगवान विष्णु की कीर्ति यश सम्पूर्ण विश्व में फैला हुआ है जिसका कोई पार नहीं पा सकता। ऐसे देवता का यश गुणगान प्रेम पूर्वक करना चाहिये। क्योंकि जैसा हम स्मरण मनन करेंगे वैसा ही हमारा स्वभाव हो जायेगा। प्रेम पूर्वक परमात्मा के गुणों का गान करें किन्तु हृदय की शुद्ध भावना से ही करें। विष्णु के कीर्तन भजन गाने में किसी प्रकार की लज्जा या कुल परिवार संसार के लोगों की परवाह न करें। परंपरा से चली आ रही कुरीतियों को भी छोड़ना होगा। भगवान नारायण की उपासना तन-मन-धन अर्पण करते हुए प्रेम पूर्वक करें। श्री देव की महिमा गुण अनन्त है जिनका पार नहीं पाया जा सकता ।१।
साधो धर धर रूप अनेक, संता रा कारज सारियां । मच्छ कच्छ वाराह व्यास, नरसिंह बावन धारिया । नरसिंह बावन धरे अनन्त, हंस हयग्रीव जान । बदरीपति दत कपिलमुनि, सनकादिक पृथु मान । राम ऋषभ परशु कन्हड़, बुद्ध निकलंकी देख । जग्य ध्रुव अर हरि प्रगटे, धर धर रूप अनेक । संता रा कारज सारिया ।२।
केशो किसन करतार, गोविन्द गिरधर गाइये । कमल नैण कृपाल, चरण चतुर्भुज ध्याइये । चरण चतुर्भुज ध्याइये नै, मोहन मन में धार । गोपाल दामोदर मुकुन्द माधव, सिंवरो सिरजणहार । नाम नरहरि अन्तर्यामि, हिरदै विसन रहाय । अलख अयोनि ब्रह्म शंभू, केशो किसन करतार । गोविन्द गिरधर गाइये ।३।
हे साधों ! भगवान विष्णु ने ही समय-समय पर अनेक रूप धारण किया है और संत सज्जन महापुरूषों का कार्य किया है। उन अवतारों में सर्वप्रथम मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, बावन, हंस, हयग्रीव, नर नारायण, दतात्रेय, कपिलमुनि, सनकादिक, पृथु, व्यास, राम ऋषभ, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि, यज्ञ, ध्रुव और हरि अवतार समय-समय पर प्रगट हुए है। संत सज्जनों का कार्य बनाया है। वही नारायण ही द्वापर युग में केशव, कृष्ण, कर्ता गोविन्द, गिरधर नाम से गाये जाते थे। कमल नयन, कृपालु, दयालु, चतुर्भुज रूप से उसी प्रभु का ही ध्यान करें। चतुर्भुज धारी विष्णु के महान रूप का ध्यान अवश्य ही आनन्द दाता होगा। वही कृष्ण ही गोपाल, मुकुन्द, माधव, सर्व सृष्टि कर्ता के रूप में प्रसिद्ध हुए ऐसे देव को सदा ही स्मरण करें। अनेक नाम रूप गुण से सम्पन्न नर मानव का स्वामी सभी के हृदय की बात को जानने वाले विष्णु को हृदय में धारण करें। उन्हीं का ध्यान करें। वही विष्णु ही अलख, अयोनी, ब्रह्म, स्वयंभू है सर्व व्यापक है, उन्हें ही द्वापर युग में कृष्ण नाम से कहा गया है ऐसे दिव्य रूप गुणवान का सदा ही स्मरण करें, ध्यान करें ।३।
अनंत कला सूं आप, पूर्ण ब्रह्म पधारियां । अंस कला अवतार, बहुविध कारज सारियां । बहुविध कारज सारिया नै, नेम नित अवतार । आप जम्भगुरु आविया, पहलाद वाचा धार । कह ऊदो सुणों साधो, जपो हरि को जाप । भक्त वत्सल भगवंत खेले, अनंत कला सूं आप । पूर्ण ब्रह्म पधारिया ।४।
कलयुग में मरूभूमि पींपासर में भी वही कृष्ण गोविन्द नारायण पधारे है तथा अपनी सम्पूर्ण कलाओं को लेकर पूर्ण ब्रह्म आये है। लेकिन वहां पर सम्पूर्ण कलाओं का उपयोग नहीं करेंगे। यहां तो अपनी कलाओं के एक अंश से ही कार्य कर देंगे। क्योंकि यहां पर नियम धर्म की पाल बांधी जा रही है। जो सदा ही स्थिर रहने वाली धर्म की कड़ी होगी। जिस पर चलकर मानव युगों-युगों तक अपने जीवन का कल्याण कर सकेंगे। इस समय तो स्वयं विष्णु ही सतगुरु जाम्भोजी के रूप में आ गये है क्योंकि प्रहलाद के वचनों को धारण किया है। ऊदोजी कहते है कि हे साधों ! आप तो अन्य देवी-देवताओं, भूत प्रेतों के जप को छोड़कर विष्णु का ही जप करो। यहां तो भक्तों के वत्सल स्नेह मूर्ति भगवान स्वयं आ गये है। मरूभूमि को धन्य करने के लिये खेल खेल रहे है। अपनी लीला का विस्तार कर रहे है। वे तो अनन्त कलाओं से सम्पन्न विष्णु परमात्मा है ।४।