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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह30 / 156

साखी छन्दां की राग धनाश्री-30

काया तो मोमण रतन सरीखी, पहरे लो मोमण कोई

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

काया तो मोमण रतन सरीखी, पहरे लो मोमण कोई । सतगुरु तो मोमणों सहजे मिलियो, पूरब लिखियो सोई । पूरब लिखियो कोड़ि बारां, जम्भगुरु परचावियो । बरते अनहद अवल किरिया, गुरुजी ज्ञान सुणावियो । मुकति खेती अपार लाभै, कहयो गुरु को कीजिये । जीवत मरिये अजर जरिये, रतन काया पहरिये ।१।

यह मानव शरीर तो दिव्य रतन सदृश अमूल्य है। इस काया को तो कोई विरल मोमण ही धारण करना जानता है। इसका महत्व समझता है इस काया के द्वारा सभी कुछ किया जा सकता है सतगुरु भी इस समय सहज रूप से प्राप्त हो चुके है। यह तो हमारा ही कोई पूर्व जन्म का किया हुआ सुक्रत है। हमें ही नहीं हमारे साथ अन्य बारह करोड़ जनों को भी सतगुरु मिले है और उन्हें भी उपदेश देकर परचाया है। इस समय चारों ओर अनहद नाद रूपी बाजे बज रहे है, उत्सव मनाया जा रहा है, सर्वोच्च आचार-विचार क्रिया का पालन किया जा रहा है। गुरुजी स्वयं उन्हें ज्ञान सुना रहे है तथा सुनाया भी है। संसार की मोह माया से मुक्त होकर परम धाम को प्राप्त कर रहे है क्योंकि उन्होनें गुरु का कहना माना है। गुरुजी का तो यही कथन है कि अजर काम क्रोधादि की जरणा करो तथा जीवत ही मरे हुए के सदृश हो जाओ। अर्थात् अहंकार को छोड़ दो तुम्हें रतन काया की प्राप्ति हो सकेगी जिसे लेकर परम धाम तक पहुंचा जा सकता है ।१।

सतगुरु तो मोमणों सीख देवे, सांभलियो मेरा भाई । कूड़ कपट जीवड़ा नै भारी, पंथ मां करे ठगाई । करो ठगाई पिंड पोखो, सांच सिदक नहीं जोय हो । हिये भीतर घड़े घाटी, कांही बाहर धोय हो । कपट कर कर पिण्ड पोखो, अन्त धरती मांही रहे । दुख दुकरत जीव सहसी, सीख दिया सतगुरु कहै ।२।

हे मोमणों ! सतगुरु तो शिक्षा देते हुए कहते है कि सम्भल जाओ, सचेत होकर जग जाओ, गफलत में समय मत खोवो। इस समय यदि झूठ कपट करते हो तो यह जीव के लिये भारी पड़ जायेगा। तथा इस पवित्र पन्थ में रहकर किसी के साथ धोखाधड़ी न करो। आपना पेट पालने के लिये ठगाई करते हो किन्तु सत्य धर्म को नहीं देख रहे हो। हृदय के अन्दर झूठ कपट की वासनाएं उत्पन्न कर रहे हो तो बाहर शरीर वस्त्र धोकर उज्ज्वल दिखने से क्या होगा। कपट करके स्वयं शरीर का तथा परिवार का पालन-पोषण करते हो और धन संचय करते हो, अन्त में तो इकट्ठा किया हुआ धरती में ही मिल जायेगा। इन किये हुए कर्मों का फल रूप दुख को जीव ही सहन करेगा। ऐसी शिक्षा देते हुए सतगुरु कहते है ।२।

कांय मोमणों थे साध कहावो, करतब करां अधूरा । हरिचंद तो कोटि सात ले तरयो, जिण करम कमाया पूरा । जिन्ह करतब किया पूरा, सोई जुगे जुग उधरियां । पहलाद हरिचंद पांच पाण्डू, सूरां सेती रत्न मिल्या । बांका सिदक जोवो माघ खोजो, कपट देख मत राचियो । झूठ बोलो किरिया ओछी, कांय काया पोखो काचियो ।३।

हे मोमणों ! आप लोग अपने को साधु भी कहते हो और कर्म भी अधूरे ही करते हो। साधु वाले कर्म नहीं करते हो तो अपने को साधु ही क्यों कहते हो। साधु तो हरिश्चन्द्र कहलाते थे जिन्होनें पूर्ण कार्य किया। स्वयं का तो उद्धार किया ही साथ में अन्य अपने प्रियजन सात करोड़ को लेकर पार पहुंचा और अन्य युगों में भी ऐसा ही होता आया है। प्रहलाद, हरिश्चन्द्र, पांचू पाण्डव ये सभी शूरवीर थे और देवताओं से जाकर मिले थे। उन्हीं लोगों का कर्म देखो और अपना मार्ग खोजो यही साधना है। किसी कपटी के फंदे में फंसकर वैसा आचरण कभी न करें। ये कपटी जन झूठ बोलते है उनकी क्रियाएं अशुद्ध होती है ऐसी ओछी क्रिया करके अपना पेट भरते है ऐसा काची काया के लिये न जानें क्यों करते है ।३।

माया तो मोमण मेर करावै, लिछमी आय बिडाणी । काचो पिण्ड जिवड़ै रे साथ चालै, सुकरत संचो पिराणी । सुकरत संचो जीव पिराणी, जिण संग दुस्तर तिरै । चांद सूरज पवन पाणी, साख सतगुरु आदरै । संसार सलियर कवल कूड़ो, कलिकाल कण लीयो । गुरु के वचने मेर छोड़ो, जिन्हां सुक्रत संचि लियो ।४।

हे मोमण ! जो माया के वशीभूत हो जाता है वह तो मेरा तेरा में ही फंस जाता है, माया तो माया ही है न कोई मेरी है और न कोई तेरी है। वहां कलह कंगाली आ जाती है। लक्ष्मी का वासा नहीं रहता। माया और लक्ष्मी साथ में नहीं रहती। जिस पिण्ड के लिये यह सभी कुछ किया जाता है वह तो साथ में नहीं जायेगा। क्योंकि कच्चे शरीर को साथ में ले जाने की अनुमति नहीं है। इसलिये हे प्राणी ! सुक्रत पुण्य कर्मों का ही संचय करें वे ही साथ जायेंगे और वैतरणी से पार उतार देंगे। यहां पर मानव के कर्त्तव्य कर्म का या पाप कर्म को देखने वाले तथा आगे साक्षी देने वाले सूर्य, चन्द्रमा, पवन, पानी आदि सर्वत्र मौजूद है। यहां संसार में आकर मानव शरीर से ही चिपक जाता है अपनी ही की हुई प्रतिज्ञा को ही भुला देता है। इस कलयुग में आकर अपने वचनों को किसने निभाया कवि स्वयं ही उतर देते हुए कहता है कि जिसने भी गुरु वचनों को श्रवण करके मेर माया छोड़ दी और पुण्य कारक कर्म किया है उसी ने ही अपने वचनों को निभाया है ।४।

सतगुरु सिंवरो एक मन ध्यावो, दीन कथो जाम्भाणो । गुरु के वचने निव खिव चालो, साच सही कर जाणो । साच सही कर जांण रे जीव, छाड़ो मन दुभांतिया । सुरां सेती मिल्या नांही, पंथ मांही भ्रांतियां । लबधी मेलो माघ खोजो, अजर जरो जीवत मरो । कह ऊदो पार पहुंचो, सेवा सतगुरु की करो ।५।

हे मोमणों ! सतगुरु का स्मरण करो और अनन्य भाव से भगवान की भक्ति एवं ध्यान करो तथा जाम्भोजी महाराज के द्वारा बताया हुआ श्रेष्ठ धर्म का पालन करो। उसी का ही कथन करो। गुरु के वचनों में श्रद्धा करके अवश्य ही स्वीकार करो। उन्हें सत्य, हितकारी वेद वाक्य समझो। रे जीव ! यह सत्य जानकर मन की भ्रान्तियों को मिटा दो। जब तक पंथ के विषय में भ्रान्तियां रहेगी तब तक देव से मिलन नहीं हो सकेगा। लोभी कुलालची आदि संसारिक जीवों को छोड़कर अपने मार्ग की खोज करो तथा जीवन की विधि अजर जरणां करके खोजो। संसार में रहकर प्रत्येक के साथ नम्रता का व्यवहार करो। ऊदोजी कहते है कि अवश्य ही जन्म-मरण के चक्कर के बन्धन से छूट जाओगे, यदि सतगुरु की सेवा करके उनसे कुछ हासिल करके जीवन में धारण करोगे ।५।