साखी छन्दां की राग धनाश्री-29
बाजै बाजै रे मादलियां सरलै साध नै, स्वामीजी रा सबद सुहावणां
कवि: ऊदोजी नैण
कवि परिचय — ऊदोजी नैण
जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।
बाजै बाजै रे मादलियां सरलै साध नै, स्वामीजी रा सबद सुहावणां । दिल भीतर मोमणों पुरैली चौकनै, हिरदै साल्हियां बुलाऊंली मोमणां । थूल प्रचंड परहरो मोमण चोखा, जास हरि हम रल्या । कृतयुग पहलाद सीधो, पांच करोड़ी ले तिरयो । पाणी मांहि राख लियो, नांही हो हूं पर न जल्यो । तोइ विष्णु को नाम न छाड्यो, दैत दावण झूरियो । भेर भोगल शंख बाजै, चौक चंदन पूरियो ।१।
गुरुदेव द्वारा बतायी हुई सरल साधना से नाद ध्वनि बजने लगती है। 'ओम शब्द गुरु सुरति चेला' यही साधना तथा सिद्ध मंत्र है। इस साधना से नाद ध्वनि सहज में ही श्रवण होने लगती है। जिस प्रकार से शरीर पर पहने हुए अलंकार मादलिया आदि गहने परस्पर संयोग से स्वाभाविक ही बजने लगते है। ऐसी प्रिय ध्वनि जो स्वामी परमात्मा की है वह सुनने में बड़ी ही सुहावनी लगती है। हे मोमणों ! मैं हृदय रूपी हवेली में ही उस इष्टदेव को चौक बनाकर बिठाऊंगी। और उसी हृदय में ही साल्हिया सुलझे हुए भक्तों को बुलाकर बिठाऊंगी। वहीं पर ही श्रीदेवजी से दिव्य सत्संग होगी। वहीं पर दिव्य शब्द का श्रवण सहज ही में होगा। ऐसा बुद्धि का कथन है। अच्छे-अच्छे मोमण भक्तों को बुलाकर मैं उनकी सेवा करूंगी किन्तु जो स्थूल बुद्धि वाले कठोर, निर्दयी एवं क्रोधी है उन्हें मैं त्याग दूंगी। ऐसे हरि के भक्तों का संग हरि से मिलाने वाला है। आगे परम भक्तों का परिचय देते हुए कवि बतला रहे है कि सतयुग में प्रहलाद भक्त ने अपने साथ पांच करोड़ को लेकर पार उतर गये। प्रहलाद को अनेकों कष्ट दिये गये, जल में डुबाया गया, अग्नि में जलाने का प्रयत्न किया गया परन्तु हरि ने वहां पर रक्षा की थी। अनेक विपदाएं प्रहलाद ने सहन की थी परन्तु हरि का नाम नहीं छोड़ा। आखिर दैत्य हिरण्यकश्यपू का विनाश श्री हरि ने ही किया था। उसी समय ही अनेक भेरी शंख नगाड़े बज उठे थे और चंदन की चौकी पर बिठाकर प्रहलाद की पूजा की थी ।१।
जुग तेता रे मोमण, हरिचंद नै जिग रचावियो । सत संजम रे मोमणा, धर्म आचार नै निज फल पावियो । निज फल जिग पावियो, जिण एकान्त मन कियो । जीव काजै नारी परची, शाह घर पाणी छल्यो । सत न छाड्यो धर्म न हारयो, हुवो दणियर साखियो । सातां क्रोड़ां को मुखी हुवो, जुग त्रेता हरिचन्द तारियो ।२।
त्रेतायुग में सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने यज्ञ रचाया था। स्वयं सत्य, संयम, धर्म का आचरण किया था और उसका फल भी प्राप्त किया था। हे मोमण ! फल तो वही पायेगा जो मन लगाकर धर्म का आचरण करेगा। स्वयं हरिश्चन्द्र ने अपना तन तथा अपनी प्रिया तारादे को भी बेच दिया था। स्वयं ने नीच कार्य किया और देवी तारा ने भी पर सेवा करके अपने धर्म को नहीं छोड़ा, धर्म से विमुख नहीं हुए इस बात का यह सूर्य देव साक्षी है। इस प्रकार से हरिश्चन्द्र ने त्रेता में अपना तथा अपने ही सात करोड़ अपनी प्रजा का भी उद्धार किया था ।२।
जुग द्वापर रे मोमणो, पांचो वीर नै संग द्रोपदी । सतवादण रे मोमणो, कूंता दे मांय नै गति ले तरी । सत वादण रे मांय नै, कूंता तिरी गति नै तारनै । हुंवता चड़िया बेड़े, लंघिया भवजल पार नै । सतवादी धर्म धीरा, करणी साच सधीरणां । नवां करोड़ां रा मुखी हुवा, जुग दवापुर पांचूं वीरणा ।३।
द्वापर युग में पांचों पाण्डव जो वीर थे उनके साथ में उनकी भार्या द्रोपदी तथा माता कुन्ती थी इन्ही सभी ने मिलकर सत्य के मार्ग को अपनाया था। सामुहिक धर्म को निभाने वाले ये संसार सागर से पार उतर गये। ये सत्यवादी धर्म, धैर्य, कर्त्तव्य कर्म करने वाले थे इसलिये द्वापर युग में अपने साथ नौ करोड़ को लेकर पार पहुंचे थे। इस प्रकार से ये द्वापर युग के धर्मवीर थे ।३।
कलिजुग रे मोमणो, करणी कमाणो ऊदो यूं भणै । जुल चालो रे साचे साहिब के पंथ नै, जीव काजै आपणै । जीव काजै भलो कीजै, है है बूरो न कीजिये । आये सुभ्यागत सेवा कीजै, पगे निवण कीजिये । आयो सुभ्यागत गुरु कर मानों, करियो वांहरी सेव जी । अनंत करोड़ा को मुखी आयो, कल्य जुग जम्भराज देवजी ।४।
ऊदोजी कहते है कि हे भक्तों ! इस कलयुग में कर्त्तव्य कर्म करो। सभी मिलकर सच्चे साहिब के पंथ पर चलो। अपने जीव की भलाई के लिये कुछ करो। यदि कुछ करना है तो जीव की भलाई के लिये अन्यथा हे मानव ! जान बूझकर किसी का बुरा मत करे। घर पर आये हुए सुभ्यागत की सेवा करो और आदर सहित मीठी बाणी से स्वागत एवं नमन प्रणाम करो। सुभ्यागत देव स्वरूप ही होता है उसकी सेवा ही देव सेवा है। इस कलयुग में जाम्भेश्वर जी आये है जो युगों-युगों के योगी है और अनन्त करोड़ भक्तों को पार उतारेंगे ।४।