साखी-78
पहले पहरे रैणिं का बिणजारिया, तैं जनम लियो संसारवे
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सवैया
विसँन धै तुठो पार विष्णु बैकून्ठ बसाव।
विष्ण को जपन्ता नांव निगुण नर हाँसो आवै।।
रहंसं जांधर जाहि जित को भूत खिलावै।
रहसी विणसै जीव लोभ करी हत्या कुंमाव।
द्यै हैं अनेक दान गल काटे सुक्रत गुर्वें
विष्णु भक्त ऊदो कहै अनन्त जुणि भुला भुवैं।।
पहले पहरे रैणिं का बिणजारिया, तैं जनम लियो संसारवे
वाचा चूको आपणी बिणजारिया, तेरी बालक बुद्धि गंवारवे
बालक बुद्धिगंवार न चेत्यो, भूलो माया जालवे
अब पीछे क्या होय पछितायां, जल पहिले न बांधी पालवे
बीस बरस को भयो अयाणो, थंभ न सक्यो भारवे
जन 'रविदास' कह बिणजारा, तैं जनम लियो संसारवे( १ )
दूजे पहरे रैणि का बिणजारिया तूं निरखत चाल्यो छांहवे
बदे साहिब न जाणियो बिणजारिया तूं लेय न सक्यो नांववे
नाम न लीयो औगुण कीयो, इस जोबन के ताणवे
अपणी पराई गिणी न काई, बांधी अमल कमाणवे
साहिब लेखो लेसी तूं छलि देसी, भीड़ पड़े तुझे तांहवे
जन'रविदास' कह बिणजारा, तूं निरखत चाल्यो छांहवे( २ )
तीजे पहरे रैणि का बिणजारिया तेरा ढीला पड़या पिराणवे
काया री वाणी क्या करे बिणजारिया गढ भीतर बसे अजाणवे
बसे अजाण काया गढि भीतर, अहल्यो जनम गमायवे
अबकी बेर न सुक्रत किया, बहोड़ि न यह तन पायवे
छीनी देह काया कुमलाणी, तद मूर्खो पछताणवे
जन 'रविदास' कह बिणजारा, तेरा ढीला पड़या पिराणवे ( ३ )
चौथे पहरे रैणि का बिणजारिया तेरी थरहर कांपी देहवे
आयो हंकारो श्याम को बिणजारिया छोड़ी पुराणी थेहवे
थेह पुराणा छोड़ अयाणा, बालद लाद सवेरियां
जम के आये पकड़ि चलाये, बारी पूगी तेरियां
चल्या अकेला पंथ दुहेला, का सूं करै सनेहवे
जन 'रविदास' कह बिणजारा, तेरी थरहर कांपी देहवे ( ४ )