साखी-81
मुंधे मुख दश मास, ओदर मांय रह्यो
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मुंधे मुख दश मास, ओदर मांय रह्यो
पिंड दुःख पायो रे, दुःख संकट सह्यो
सह्यो संकट उदर ऐसो, चित्त में चिंता घणी
अवर अबकी बार करहुं, भक्ति साधौं हरि तणी
ओदर अन्दर बोल बोल्या, बहुरि जुग जन्म भयो
संसार की जब पवन लागी, मूढ सब विसर गयो (१)
बाल पण खोयो, बालक अब विकल भयो
चेत न संभाल्यो, भाख भखी अन्तर ना रह्यो
ना रह्यो अंतर भाख भाखी, राल मुखि बाला चूयो
पड़यो लोटै धरणि ऊपरि, रोय करि अस्तन पिया
मूत विष्टा रह्यो बैठो, सूक्रत न कीयो कोयवे
भूल्यो तूं भोदू भगति हरि की, बालपण यसों खोयवे (२)
वृथा जोबन विसारियो, मदमाता चहुं दिस फिरै
पर धन पर त्रिया, देख जोबन को हरै
मन रोवै पर धन देख त्रिया, चित्त ठौर न राखियो
अमि तज कर पीवै विषरी, विषय विष सूं राचियो
काम माया मोह माता, परब्रह्म विसारियों
भूल्यो हरि की भगति भोदू, वृथा जोबन विसारियो (३)
भवसागर दुस्तर तिरो, जुरा बुढापो प्राणी आइयो
सुध बुध बिसर गई, परवस पड़यो पछिताइयो
पछताय जब सुध बुध बिसरी, श्रवणे शब्द न बूझही
जीव कारण करै लालच, नैण जगत न सूझही
भणैं 'सुदामो' सुणो रे नर, भरम भूल्या क्यों फिरो
कीजै भाव से भगति हरि की, भवसागर दुस्तर तिरो (४)