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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-80

सदा न संग सहेलियां, सदा न राजा देशवे

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सदा न संग सहेलियां, सदा न राजा देशवे

सदा न जग मां जीवणा, सदा न काला केशवे

सदा न काला केश जगपति, सोच स्वामी मुझि भया

जीवन अंजरी नीर जैसे, मिलो माधो करि मया

मया कीजे दरश दीजे, पीजे प्रेम अघायवे

आनंद उपजे निस दिनां, पीव पडूं तेरे पायवे

पडू तेरे पाय प्यारे, जो आया सो खेलिया

वाजिंद कहत विचारि स्वामी, सदा न संग सहेलिया (१)

मृगतिसना संसार है, पुर पाटण क्या हाटवे

पार पोहती नाव ज्यों, होग्या बारां वाटवे

होग्या बारां वाट हरि बिन, सुपनंतर नहीं मेलवे

आठुं पहरि अवटणो, ज्यों कड़ाही तेलवे

तेल अवट अगन सेती, मै ऐसी अजरी जरूं

जामें प्रवीन प्रान प्यारे, कहो अब कैसी करूं

करूं कैसी जामें ऐसी, तज्या भूख अहारवे

वाजिंद कहत विचारि स्वामी, मृगतिसना संसारवे (२)

तन तरवर मन पंछियां, लिया बसेरा आयवे

भोर भया सब उड़ि चल्या, योह जग झूठा जानवे

जग झूठा नांह रूठा, दोय दुःख कैसे सहूं

रैन अकेला बिनां बोल्या, विरह शील तामें बहूं

विरह शील तामैं बहुंवोरी, पास न देख्यो पोववे

लोहु पानी होय गया, तालाबेली जीववे

जीव तरसे गिगन बरसे, पीव दिखावो अंखियां

वाजिंद कहत विचारि स्वामी, मन तरवन मन पंछियां (३)

योह विरियां बोहरयो नाहीं, हो हो हो बलि कंटवे

वारी फेरी बलि गई, अंत न लीजे अंतवे

अंत न लीजे दरश दीजे, जीव न दीजे दुःखवे

च्यारों दिशा झिंकोरिया, झूरे अकेला रूंखवे

रैन अकेला रूंख निस दिन, किसे सुणावूं रोयवे

शीत ओस सिर पे सहूं, संग न साथी कोयवे

संग न साथी काम हाथी, कृष्ण कर अपणी गही

वाजिंद कहत विचारि स्वामी, यो विरियां बहुरि नहीं (४)

वेगा विलंब न कीजिये, जे किस दिस लागिवे

बहुत गई थोड़ी रही, जे उठि देखूं जागिवे

जागि देखूं रही थोड़ी, इस मांय घटायवे

जुरा आगे जम पीछे, पीसण पहुंचा आयवे

पीसण पहुंचे आय इसकुं, किजे चित्त सवेरियां

काम रूप कुलछणां, पीव साध ज तेरियां

साध तेरी आणि घेरी, दादि इसकी दीजिए

वाजिंद कहत विचारि, वेगा विलंब न कीजिए (५)