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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-94

म्हारा प्राणियां रे जग में तो दातार बड़ो,

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

म्हारा प्राणियां रे जग में तो दातार बड़ो,

विध सूं सुणो विचार ॥ टेर ॥

जल जीवण रिषि आपियो, कठियारे करधार

बलिराजा चकवै हुयो, दान तणै उपकार ।

रांके दत्त रांके दियो, भाव भुजा भल भीख

मानधाता महि ऊपरे, अमर हुवो मण्डलीक ।

हाथ द्वादश लूगड़ो, दीन्हो हरि के हेत

दुर्योधन दीठो दूनी, जनम्यो छत्र समेत ।

एक अधोड़ी दान दीवी, कर पुरोहित सूं प्रीत

संसार सुण साको कियो, हुयो विक्रमाजीत ।

भूपति पोख्यो बाघने, विध सू विप्र विचार

दान दियो राजा मोरधवज, आधा अंग उतार ।

सींचाण सींवर सन्तोषियो, तन कांप्यो करधार

अस्थि त्वचा दोनों दियो, देव कह्यो दातार ।

पोहमी प्रगट बादशाह, तास समौं सैतूल

हेतम हेत कर सौंपिया, कीयो कौल कबूल ।

रावण शिवनैं सौंपिया, दश मष्तक दश बार

नवग्रह रावण बांधिया, दान तणैं उपकार ।

पहिले परमल सींचियो, ऊपर सींधो सींच

साख रही संसार में, दीयो दान दधीच ।

अनेक अनेक अरु उधरया, गिणत न आवै पार

जन ‘केशव’ की वीणती, म्हारी आवागवण निवार ।