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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-93

सरस हिंडोलणो संभरथल, झूलै हो साध । टेर

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

हरि की महिमा अन्नत कहो कुण पर्ण सुनावे

शेष सहस्त्र मुख रटत, तास गुण पार न पावे

ऋषि नारद गौतम ब्रह्मा, विष्णु महेश्वर

इन्द्र चन्द सूरज व्यास जेहि देव भजेहर

नेति नेति सारा कहयो, किणिय न पायो पार

प्रकट आयो कह लूणकरण, जम्भ गुरू किरतार

सरस हिंडोलणो संभरथल, झूलै हो साध । टेर

दोय शील संयम थंभ रोपे, नाँव बेड़े आधार

चार डांडी सरल सुन्दरी, वेद के झणंकार

सत्य धीरज बणे मरवो, जड़त प्रेम सवार

सुरत पटड़ी बैठ कर, थे झूलो जंभद्वार (१)

लोहट हांसा भाम पूरे, जिण लियो उर लाय

नोरंगी के भात ल्याये, संग साल्हिया आय

सिरियां झीमा रूपां मरियां, मांगी पूर्व प्रीत विचार

दोय कंवर आगै धरै, लाछां आये झूलणवार (२)

भुवा तांतू चली झूलण, नायकी लीवि बुलाय

अजब देश वीरदे तहां, झाली पोंहेती आय

लोचां गवरां अवर मांगू, पालै वचन विचार

उदो अतली हेत सेती, झूले जंभद्वार (३)

राव दूदा टोहा ठकरा, केल्हण वरसंग लेख

लोहापांगल भींया परच्या, सोहन नगरी देख

रावण गोविंद लक्ष्मण पांडु, मोतिये के भाय

रणधीर अली सैंसा साल्हा, सहजे देत झुलाय (४)

खींया नाथां पूर्व झूमां, राणा प्रीति विचार

कोजा बूढ़ा लूणा सायर, आये पूल्ह पुंवार

धन्नो बिच्छु सुरगण भवंरा, चेला कुलचंद पियार

प्रहलाद की परतंग्या कारण, विष्णु को अवतार (५)

महाराज दाउद घाटम पूरो, थापन हर खेता

धारू चोखा वैरा प्रीत, हिरदे धरी मंगला रेड़ा

हासम कासम संता सेती, सदा रहे सहाय

तास सैंसो ऊदोदास, आयो पांच को समझाय (६)

रावल जैतसिंह सांगा राणा, लूणो मालदे राव

महम्मद खान मुल्ला सधारी, आये परसे पाव

शाह सिकंदर राव शांतल, शेख सद्दू जाण

कान्हां तेजा अल्लू चारण, बलि बलि करत बखाण (७)

हुकम ऊदो दीन बोल्यो, वील्ह कियो उपदेश

सुजा सुरजन आलम केशव, ज्ञान का उपदेश

चन्दन रायचंद जसो पंचायण, शब्द का आचार

‘हीरानंद’ की अरज एती, संगत पार उतार (८)