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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह135 / 156

साखी-134

सतगुरु कृपा करी मेरा जीवो, केवल ज्ञान बतायो

कवि: ऊदोजी अडिंग

कवि परिचय — ऊदोजी अडिंग

वि. सं. 1818-1933 के मध्य जीवित रहे है। समाज में तीन ऊदोजी नाम से कवि भक्त हुए है। प्रथम ऊदोजी तापस दूसरे ऊदौजी नैण तथा तीसरे ऊदोजी अड़िंग। इन्होनें अपने जीवन काल में प्रहलाद चरित्र, विष्णु चरित्र, कक्का छतीसी एवं फुटकर साखियां एवं प्रसिद्ध रचना "लूर" की थी। एक समय जोधपुर के गांवों में ऊदोजी भ्रमण कर रहे थे उस समय होली के दिन थे। ऊदोजी ने देखा कि स्त्रियां अश्लील गाने गाते हुए नृत्य कर रही थी। उस समय ऊदोजी ने उन्हें मना किया और कहा ऐसे गाने नहीं गाने चाहिये। तब उन महिलाओं ने कहा कि इन होली के दिनों में हमें क्या गाना चाहिये। स्वामीजी आप ही बतला दीजिये? तब उसी जगह पर बैठकर यह "लूर" ऊदोजी ने गाकर सुनाई और बोले यह कृष्ण गोपियों का गीत गाया करो। वही लूर यहां नीचे दी जा रही है। जो समाज में बहुत ही प्रसिद्ध है।

सतगुरु कृपा करी मेरा जीवो, केवल ज्ञान बतायो । तां दिन भेद लहै मेरा जीवो, ब्रह्मज्ञान सुध पायो । ब्रह्मज्ञान पायो मन दृढ़ायो, तजो विषय अरू वासना । भगती चाहूं मोक्ष पाऊं, और कछु नहीं आसना । आन देव कूं नांय धोकूं, नांव निज हृदय धरूं । तां दिन आत्म ज्ञान पायो, कृपा करी जम्भ गुरु ।१।

सतगुरु ने ऐसी दिव्य कृपा करके हमें कैवल्य ज्ञान बताया है। उस दिन सत्य असत्य का निर्णय होगा जिस दिन शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति होगी। ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुई उससे मन में दृढ़ता आ गई। विषय वासना का परित्याग हो गया। हे देव ! मैं मुक्ति तथा भक्ति चाहता हूं और मेरी कोई वासना नहीं है। आन देवता की पूजा नहीं करूंगा। हृदय में केवल विष्णु नाम ही धारण करूंगा। जिस दिन गुरु जाम्भेश्वर जी ने कृपा की थी उसी दिन आत्म ज्ञान की प्राप्ति हो गई ।१।

भंवर गुंजार ध्यान धरो मेरा जीवो, प्रगटे दीपक माला । अणभय ज्ञान भयो मेरा जीवो, हिरदै ज्ञान उजाला । भयो घट में ज्ञान दीपक, जाग सुरता देखिये । ठाम ठाम सब वस्तु दरसे, अलख पड़दै पेखिये । रतन पदार्थ मांह लाधो, हृदय कंवल दरसावना । भंवर भमंग गुंजार मांहीं, हुयो हृदय चानणां ।२।

हे मेरे जीव ! दसवें द्वार में भंवरे के गुंजार सदृश नाद ध्वनि हो रही है, वहां पर चित लगाओ। नाद ध्वनि में चित की एकाग्रता होगी तब वहां अनेक दीप मालाओं का प्रकाश दिखाई देगा। उस समय अनुभव ज्ञान होगा। हृदय में उजाला हो जायेगा जिससे हम अपने घर के आनन्द का पता लगा सकेंगे। घट में ज्ञान रूपी दीपक प्रज्वलित हो जायेगा। हे सुरति ! जागृत होकर देखते रहना। ऐसी अवस्था में जो वस्तु जहां रखी है वहीं पर दूर देश में भी दिखलाई देगी अर्थात् सर्वज्ञ हो जायेगा। परदे के पीछे वह अलख निरंजन दिखाई देगा। एवं हृदय रूपी कमल में वह देव दर्शन देगा। मानों रत्न बहुमूल्य पदार्थ अन्दर ही छिपा हुआ था हम कहीं बाहर ढूंढ़ रहे थे। इस प्रकार से शब्द ध्वनि रूपी भ्रमर गुंजार से हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जायेगा ।२।

नाभि सूं नाडी चली मेरा जीवो, बंक एक नाड़ बखाणी । ऊंची गगन गई मेरा जीवो, भेद कोई बिरला जाणे । भेद बिरला जाणै, चढ़यो गिगन अटारियां । निरत सुरत को ख्याल देख्यो, चंद सूर दोय नाड़िया । नजदीक नैणां लाल झांई, जोत दरश लिव लावणां । बांये अंग नाडि पिंगला, बंक नाडी रस पीवणां ।३।

नाभि से एक नाड़ी चलती है वह बंक नाड़ी से मिलती है। वहां से आगे बढ़ती हुई त्रिबंके यानि त्रिवेणी में अर्थात् गगन यानि दसवें द्वार में पहुंचती है। आगे दसवें द्वार में स्थिर हो जाती है। प्राणवायु भी वहीं पर स्थिर हो जाती है तब साधक समाधिस्थ हो जाता है। इस भेद को कोई बिरला ही जान पाता है। चंद सूर दोनों नाड़ियां जब त्रिवेणी सुषुम्ना में जाकर मिल जाती है तब निरति सुरति यानि मन की एकाग्रता का खेल देखती है। उस समय आनन्द दूसरा ही होता है। नेत्रों के निकट लाल-लाल ज्योति का दर्शन होता है। इस प्रकार की ज्योति दर्शन से साधक आनन्द में मस्त हो जाता है। शरीर के बांये हाथ में बंक नाड़ी है उसी नाड़ी द्वारा रस की प्राप्ति होती है। इसे इडा-चन्द्र भी कहा जाता है। दाहिने भाग की नाड़ी को पिंगला यानि सूर्य भी कहा जाता है। दोनों नाड़ियों की समानता को सुषुम्ना यानि सरस्वती भी कहा जाता है ।३।

विना पग चले मेरा जीवो, विना मुख हरि गुण गावै । श्रवण विना शब्द सुणै मेरा जीवो, कर विना ताल बजावै । अनहद बाजा गिगन बाजै, ब्रह्मरूप होय पूगे । त्रिवेणी तट हंस अधर बैठो, अमोलक मोती चुगे । जोत झिलमिल इमी बरसे, तड़ तड़ चमक बादल बिना । विना पांव नटवा निरत नाचे, रंरंकार धुन विना ।४।

ऐसी दिव्य समाधि अवस्था में हरि स्मरण स्वतः ही चलता रहता है वहां पर हाथ पैर जिभ्या मुख श्रवण शब्द की कोई आवश्यकता नहीं होती। अनहद नाद ध्वनि दसवें द्वार गगन मण्डल में नित्य ही होती रहती है। वहां पर ब्रह्मस्वरूप होकर ही पहुंचा जा सकता है गंगा यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी पर जीव रूपी हंस विराजमान होकर अमुल्य आनन्द रूपी मोती चुगता है। वहां पर ज्योति की झिलमिल जगमग हो रही होती है। अमृत की वर्षा होती है। बिजलियां चमकती है किन्तु बादल रूपी माया का वहां नामोनिशान ही नहीं होता। बिना ही पैर के नृत्य करने वाला मन वहां पर खुशी के मद में नाचने लगता है। वहां नाद ध्वनि ओम के अतिरिक्त और कोई ध्वनि नहीं होती ।४।

जीवन मुक्ति भई मेरा जीवो, मिट गई त्रिविध बाधा । जामण मरण मिटा मेरा जीवो, निर्भय भयो निरासा । भयो निर्भय सुण सतगुरु को, काल प्रबल तो ना डरूं । द्वार दसवें गगन चढ़ कर, सोह सिकर डेरा करूं । सतचित आनन्द भेद निरगुण, धुंध मंडल पावई । लिछमण पद सायुज्य पायो, मुक्ति जीवत ही भई ।५।

तीन प्रकार का ताप वहां पर मिट जाता है तथा जीवन मुक्त हो जाता है। जन्म मरण के चक्कर से छूट जाता है। आशाओं से रहित होकर सर्वथा निर्भय हो जाता है। सतगुरु की बतायी हुई विधि श्रवण करके निर्भय हो जाता है। प्रबल काल से भय नहीं रहता। दसवें द्वार पर पहुंचकर ओम सोहम् शिखर पर अपना आसन लगा लेता है। वहां पर शून्य मण्डल में सतचित आनन्द स्वरूपी निर्गुण की प्राप्ति हो जायेगी। लिछमणजी कहते है कि वहां सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति हो जायेगी तथा जीवन मुक्त हो जायेंगे ।५।