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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह136 / 156

साखी सोरठा-135

निस दिन श्वांस घटे मेरा जीवो, छः सौ इकीस हजारा

कवि: ऊदोजी अडिंग

कवि परिचय — ऊदोजी अडिंग

वि. सं. 1818-1933 के मध्य जीवित रहे है। समाज में तीन ऊदोजी नाम से कवि भक्त हुए है। प्रथम ऊदोजी तापस दूसरे ऊदौजी नैण तथा तीसरे ऊदोजी अड़िंग। इन्होनें अपने जीवन काल में प्रहलाद चरित्र, विष्णु चरित्र, कक्का छतीसी एवं फुटकर साखियां एवं प्रसिद्ध रचना "लूर" की थी। एक समय जोधपुर के गांवों में ऊदोजी भ्रमण कर रहे थे उस समय होली के दिन थे। ऊदोजी ने देखा कि स्त्रियां अश्लील गाने गाते हुए नृत्य कर रही थी। उस समय ऊदोजी ने उन्हें मना किया और कहा ऐसे गाने नहीं गाने चाहिये। तब उन महिलाओं ने कहा कि इन होली के दिनों में हमें क्या गाना चाहिये। स्वामीजी आप ही बतला दीजिये? तब उसी जगह पर बैठकर यह "लूर" ऊदोजी ने गाकर सुनाई और बोले यह कृष्ण गोपियों का गीत गाया करो। वही लूर यहां नीचे दी जा रही है। जो समाज में बहुत ही प्रसिद्ध है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

निस दिन श्वांस घटे मेरा जीवो, छः सौ इकीस हजारा । पल पल श्वांस घटै मेरा जीवो, हरदम सीजै थारा । दम सीज जम लेण आवसी, पकड़ ले जावसी । धन माल माया रहावसी, पीछे घणों पछतावसी । तै नाम न लियो सुकरत कियो, छोड़ चल्यो घर बार ही । निश दिन श्वांस घटे मेरा जीवो, छः सौ इकीस हजार ही ।१।

अब तुम वृद्ध भयो मेरा जीवो, पींजर पड़यो रे पुराणों । इन्द्रियां रो तेज घट्यो मेरा जीवो, उठ गया देव दीवाणों । उठ्यो दीवाणों भयो बहरो, मुख नैणां पाणी झरै । शीश धूजै नांय सूझै, अधर अधर पगलां धरै । पड़यो परवश करै गिरणां, गुण गोविन्द नहीं गावियो । पींजर तेरा पड़यो पुराणो, बुढ़ापो बेगो आवियो ।२।

हरि को भजन करो मेरा जीवो, ज्यूं साहिब मन भावो । भजन करणां अजर जरणां, क्षमा दया हृदय धरो । लोभ अहंकार क्रोध तजियो, आप जीवत ही मरो । कीजिये नित साधु संगति, महा अमीरस पीजिये । एक मन एक चित करो भक्ति, दूर दुबध्या कीजिये ।३।

स्वर्गावास देवो मेरा जीवो, भवसागर दुख हारो । कोटि असंख्य फिरयो मेरा जीवो, खट् रूत में दुख सारो । नाम प्यारो जीव निस्तारो, सकल अंग दुख सीजिये । वाद विवाद निंदा न करणी, मन अपणों बस कीजिये । पाप संगत सब पर हरो, सु संगत नित कीजिये । कहे सुरजन करो करणी, मुक्ति का मार्ग दीजिये ।४।

सुरजन जी द्वारा रचित यह साखी है। इससे पूर्व सुरजनजी द्वारा रचित साखियों का भावार्थ हो चुका है। यह साखी छूट गई थी इसलिये यहां पर दी जा रही है। इसका अर्थ भी सरल ही है इसलिये विशेष रूप से अर्थ करने की आवश्यकता नहीं है। प्रथम छन्द में श्वांस घटने की बात कही है प्रतिदिन इकीस हजार छः सौ श्वांस घटते जा रहे है। द्वितीय छन्द में वृद्धावस्था का वर्णन किया है जो सभी के सामने है। तृतीय छन्द में काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि त्याग करके हरि स्मरण की बात कही है। चौथे छन्द में मुक्ति की कामना कवि ने की है।