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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-131

सत सुपनंतर दीठड़ा सखी, मेरे मन उपज्यो सत भाव

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सत सुपनंतर दीठड़ा सखी, मेरे मन उपज्यो सत भाव

जाणो रिण जीड़ा विष्णु दले, तेहु भण त्रिभुवण राव

रावो वाव सही सूं आयो, सुर नर लायो जोड़ करै,

दुल दुल घोड़ा खड़ग तिधारो, मेघाडंबर छत्र सिरै

धरहरै घटा बिजली झिलोर, चीमण चीण पईठो

कहै दुलम देश सुण्यो हो कालंग,सत सुपनंतर दीठो (१)

उदीया पर्वत पोल ढही, साखत करो सुवारी

नव वेर हारीयड़ो कवल सेरे, उत्पति कहूं तुम्हारी

उत्पति कहूं तुम्हारी कालंग, राय विष्णु सूं वाद किसो

चार चक नव दीप नवाया, लख चोरासी जीव सीस्यो

जुरा मरण भौ भांज जंभराय, मेर चुकावै तांस सही

धर धूजे असमान थरहरै, उदीया परबत पोल ढहो (२)

घण हर गाज पड़यो वर्षा करे, यो पाणी रह्यो निवाणी

उन्हो ठाढो यो जोग मिल्यो, अति तूठै खुरसाणी

अति तूठै खुरसाण सहीसूं, पोह विहुंणा थाकी

अतिक गरब गई कल तोट, मलब रही न बाकी

कटक खंधार जुड़ी गढ दिल्ली, लसकर हुई अवाजा

पिच्छम ते घन ओल्हरि आयो,बिरखा करे घण गाज्यो(३)

पारगिराय हुवो सुखी अभखल तजो खुंवारी,

ओ जुग चौथेयड़ो कलि जीवड़ा की बारी

अमी कचोला हींड हिंडोला पाट पटम्बर भारी,

चीर पटोला भोग वतावर नारी

भोग वतावर नारी सदा सूं पूंजी, जीव जुगति सिरै

दस वंध दीनो हजरत लिखियो, निर्मल होय सुपात करै

मनसा सूं वां सदा रंग उपजे, छह रुति बारह मास सुखी

पांच सात नव खड़ी उडीके, परगिराय हुवो मुखी (४)