साखी-126
सांभलि-सांभलि है म्हारी पदमण माय,संभरथल रली बधावणा
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सांभलि-सांभलि है म्हारी पदमण माय,संभरथल रली बधावणा
गुरु आयो छैं जंभेश्वर देव, कलि मां काल उतावला
कलि मां तो काज उतावला नैं, हरखि जर कंकण आवियो
बारां करोड़ी मिल्या जानी, इक्कीस रे मन भावियो
चार चौचक रची चंवरी, मया करि पहुंचायनै
बैकुंठ साहो मने उमाहो, सांभलि पदमण मायनै (१)
मेलो मेलो करि करतार, साधां मोमण रे मन रली
साह बूठो छै पच्छिम रे देश, खिंवै सवाई कुलचंद बीजली
खिंवै बिजली झिलमिलती, घटा ऊजल संचही
कर धारि अंचल, लाडी खड़ी पंथ उड़ीकही
तेरी रतन काया स्वर्ग सोहे, छाड जीव संसारनै
हंसि मिलो मोमण करो इकायंत, मिलसी करतारनै (२)
संभरथल मोमण जागी पीठ, विसाहित जंभराज आवियो
मेरो मन रातो बिन मंजीठ, मोमण होय बीरा बिणजियो
विणजो मोमण धर्म बहु विध, छोड़ मन कुबाणियां
वरत अनहद मोक्ष मुक्तां, साच सिदक पिछाणियां
छांडि मायाजाय चाल्यो, जासै हिवड़ो निर्मलो
जिकर सुणि सुणि थूल परच्या, पीठ जागी संभरथलो (३)
कलियुग मोमण स्वर्ग आश, जंभराय धर्म थापियो
झांपा री पाल छोड़ जीवड़ा, मुक्ति काजे गुरु जापियो
जपो सतगुरु जीव काजै, हर बिवाण पठाइयो
गोठि ओसर मिल्यो नाहीं ठीक चूका भाइयो
सत्त दे करतार दिल में, साध मोमण के पगे
सुशील जीवनै खता नाहीं, पार पहुंचो कलिजुगे (४)