कवि परिचय — कुम्भाराम जी पूनियां
कुम्भाराम जी पूनियां वि. सं. 1937 में जन्मे थे। ये जेगला के पुनिया गोत्र के थे। इन्होनें दीक्षा साधु हरिनारायण जी से ली थी। इनके द्वारा रचित दो पुस्तकें प्राप्त हुई है। "निर्वेद ज्ञान प्रकाश" व "पंथ यज्ञ प्रश्नोत्तरी मणि भाषा" तथा अन्य साखियां तथा भजन भी प्राप्त हुए है।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सुण मन भाई कहूं समझाई, कोप न कीजै भाई।
जन्म मरण नित भोगे चौरासी, डरे नहीं कदाई।
लख चौरासी दुख बहु भांति, मुख से वरण्यो न जाई।
आयो दांव गमावै किम मुरख, फेर मिले न सदाई।
सतसंग कर काटी जम फांसी, ब्रह्मज्ञान चित लाई।
सुत वित नारी मित्र सब बन्धु, तुम कूं रहया बिलमाई।
ये सब है मतलब के प्यारे, अंत तजोंगे भाई।
शत्रु लख इन कूं अब तजिये, ब्रह्मज्ञान चित लाई।
श्वांशो श्वांस जप जाप अजप्पा, भूलो मत ना भाई।
अनहद बाजा बाजै गिगन मां, मन कूं तहां लगाई।
अनंत भानु सम तहां उजियाला, महिमा वरणी न जाई।
सर्वदेव ब्रह्माण्ड है तन में, सतसंग कर गम पाई।
हरि हर कुम्भा एक भये, अब द्वितीया दूर बहाई।