साखी-91 राग गौड़ी
सेवगां सतगुरु बूझियो, तीर्थ कता कहावै
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सेवगां सतगुरु बूझियो, तीर्थ कता कहावै
कवन तीर्थ जाय न्हाइये, जासूं पाप दुरावै
पाप दुरावे सो किसी तीर्थ, गंगा यमुना अरू सरस्वती
प्रयाग काशी अवधा मथुरा, सेतुबंद द्वारावती
जगन्नाथ केदार बद्री, और पुष्कर न्हाइये
मुक्त हुवै सो किसे तीर्थ, सतगुरु हमें बताइये (१)
जंभेश्वर यूं भाखियो, तीर्थ कहूं बखानो
अड़सठ तीर्थ है सही, जामे फेर न जाणे
जामे फेर न जाणो, हृदय तीर्थ न्हाइये
दाम दीजे देह छीजे, फिर फिर पांव घसाइये
अड़सठ महातम मिलै इत ही, शुभ धाम प्रसाद सूं
देश फलोदी मंझ तीर्थ, बागड़ मांय बताव सूं (२)
किस विधा पावन भोमका, सतगुरु भेद बतावो
इन भोमी से कोई जीव विरयो, तहां को भेद बतावो
भेद बतावो कुण पार पहुंच्यो, कोई जीव स्वर्गे गयो
आ भोम सिधाां कही तुम ही, और प्रगट किणी न कह्यो
वेद पुराण में नहीं संख्या, ;षीश्वरा छाने क्यों रही
चार युगा में नहीं चावी, भोम पावन किस विध भई (३)
ब्रह्म सरोदक तीर्थ हुवतो, सातवें कल्प के माहीं
वहां ब्रह्मा ने यज्ञ रच्यो, पावन रिज तकी छाहीं
संहस अठयासी ;षीवार आए, मारकंडेव दत लोमियो
खट मास तक यज्ञ रची, वेदी परनाले घी होमियो
देव महेश सुरपति आए, आए विष्णु साथ ही
ब्रह्म सरोदक तीर्थ हुंवतो,सातवें कल्प की बात कही (४)
होमायत दस मास भई दुजे जिग, सुरपति देव तणां ब्योहारा
होमे घृत भगवान तिरपत, होम्यां ही घृत अपारा
होम घृत अपार जिग में, देव मुनि जय जय करै
शंख धवनि सुर पुष्प वर्षा, गन्धार्व गुन गायन करै
कलश कंचन चौक पुरयो, ब्रह्मा भेद विचारियो
शुद्ध भोम भेद विचार, सतगुरु शंकर यज्ञ रचावियो (५)
तीजो जिग पंडवां कियो, किवी सामग्री त्यारी
सुर नर सुरपति आविया, आयो कृष्ण मुरारी
कृष्ण आये जिग थाए, होम विद वेदी रची
ब्रह्मा धुनि मुख बेद उचारे, वेद व्यास श्रीमद वची
मास अठारह भई होमायत, तीन लोक तीरपत भए
पंचायन श्रीकृष्ण पुरयो, पंडवां जिग पूर्ण भए (६)
एक ही कलप तीनों भए, दत्तात्रेय भगवान भणीजै
एक ही कल्प सनकादिक, अरू कपिलदेव कल्प गिणीजै
कल्प एक कपिल गिणीजै, ये तीनों एक कल्प
ऐसे दो कल्प भए, तीजा वर्तमान कल्प
चार कल्प तक रह्यो ऊजड़, ये सात कल्प मानियो
वेद पुराण को भेद नाहीं, भेद सतगुरु जानियो (७)
इन कल्प के वर्तमान में, सतजुग बात संभारियो
सरस्वती आवत देख, ब्रह्मा कुदृष्टि निहारियो
कुदृष्ट निहारयो हर चक्र मारयो, विधि मस्तक शंकर हन्यो
ता पाप से कर चक्र लाग्यो, ब्रह्महत्या पराछित बन्यो
विचरत शिव इन भोम आए, खोद भोम आश न करयो
रिज पावन लगी करसे, शंकर कर चक्र झड़यो (८)
रजपूत बसे पड़ियाल में, कलजुग कथा संभारियो
उनकी क्रिया दुःशीलनी, जिन कंथ कटारी मारियो
मार कंत संग और धयाई, जिन छोड़यो चित्रंग ताल में
कर छै ही खावमुण कीनो, बैठी दुःख हवाल में
जेठ बदी की बीज वृहस्पति, भई वर्षा भारिया
रिज पावन लगी करसे, कर सूं झड़ी कटारिया
छले नाडे नार न्हाई, गोधो गऊ शुभ जल पियो
देह छूटी मुक्त पहुंच्या,तीनूंही जीव स्वर्ग वासो लियो (९)
कियो मनोरथ उत्तम भोम कूं, रथ चढ जंभ पधारे
एक संहस और सातसौ, साधु संत जन सारे
साधु संतं गुरु गवन कीनो, खींदासर वासो लियो
दिन दूजे इन भोम संता, आय तट डेरो कियो
षटमास तक रह्यो आसन, वहां थापी सतगुरु साथरी
नर नारी माटी सब ही काढे,जुड़या जमाती जातरी (१०)
सेवगां सतगुरु बूझियो, इन तीर्थ जल क्यों खारो
जंभेश्वर यूं भाखियो, इनको सुणो विचारो
सुणो विचार जद समंद मथियो, शेष नाग नेतो गह्यो
चवदे रतन काढ लिया, समद जल खारो भयो
मंथन करतां नीर उछल्यो, कई जोजन अलगो गयो
जहां पड़यो तहां खार प्रगटयो,यो जल खारो यूं भयो (११)
पनरासौ कै छयासठे, अगहन पक्ष अंधारा
पुख नक्षत्र और पंचमी, वृहस्पति वार सुवारा
तां दिन नींव तलाब तीर्थ, देव हुकम ओदी दई
ओ धाम ऐसो मुक्त पावो, श्री जंभेश्वर यूं कही
हवन प्रतिष्ठा करि पूजन, गोप प्रगट यूं दाखियो
तीर्थ विगत तालाब महातम,'वील्हाजी' से 'केशव' सुनभाखियो (१२)