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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-90 राग सिंधू

हटवाड़े हलचल हुवो, असुरे दीन्ही आण

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हटवाड़े हलचल हुवो, असुरे दीन्ही आण

रामइये कीवी रूड़ी, दुनी छुड़ायो दाण

जोधाणे लगै जाणियो, भले जे बीकानेर

चाल गई चित्तोड़ लग, साह नगर अजमेर

तूं सूरां सिर सूरमों, मोड़ बंधाण मयमंत

पण राखै रूंखां तणों, पोहमी प्रगट पंथ (१)

खोड़ खड़ंतै खल खिस्या, हुई सकल सराह

धनकरि बरत्यो धरां, धिन रामो धिनराह

मंझ मारू के देश, कहिये कापरड़ो

मेलो मंडोवर भोमि, नव कोटि सूं नेड़ो

नव कोट नागौर नौहर, जालौर जैसलमेर का

मुलतान मथुरा मालवो, मेवाड़ि अर आंबेर का (२)

उजीण ईडर थली थटो, हांसी अरू हिसार का

कच्छ कनवज कालपी, गुजरात गंगा पार का

सिंधु सवालख सोजत सांभर, लोक लाहोरी कितो

कांप अर सांचौर सोरठि, मड़हट मांडू मेड़तो

आगरो अजमेर दिल्ली, बीकानेर बिकुंपुरा

चार खंड सूं चाल आया, मंडयो मेलो मुरधरां (३)

सौदागर अर शाह, मिलिया बड व्योपारी

सांडि सुरह असीब ऊंठ, निपट मिल्या नर नारी

नर नारी मेलै आय मिलिया, नाद निसाणे सुरां

हटवाड़ै थाट थाटै, घणा गहम घूघरां

नारेल नाणो नव निधा, भांति भांति लाभ लाधिया

धन धरती हुवा भेला, शाह सौदागर मिल्या (४)

आरती कीजे आय, करसण सौदो कीजे

दीये वसत देवाल, लाहै कारण लीजे

लीजिये कस्तूरी केसर, मखतूल मिसरी मौलिये

कांसी तो कपड़ो मोहर मोती, कसे कंचन तौलिये

कलाकंद बदाम खारक, गिरी किसमिस अंत घणी

नर नारी मेले आय मिलिया, आरत आपो आपणी (५)

चौहटे दीने चाव, धनि धरि ऊपर छाजै

अंत डेरै हारी, तणिया तंबू बिराजै

विराजही अति तणां तंबू, पूर प्रजा पेखिये

गुदली तो गाहक मिल्या गहमह, दुनी की गति देखिये

सिरे सकल निरष नाणों, सकल वस्तु लाभै सटै

थिर काया थे थाट धारी, चाव दीसैं चोहटे (६)

सकल वस्तु संसार, विणजे शाह बिकावै

वणियां आवै अनेक, लाह कारण लावै

लावही अति काज लाहै, कपूर किरियाणो कितो

सटनाणैं सकल लाभै, बरतियो जुग मां जितो

लाभ लहिये भाग सारूं, साह सौजे रंजिये

जाम जनमी पिता पाषो, सकल बाना विणजिये (७)

दुनी उग्गह दाण, शहरी परजा सतावै

हीर पषो हुजदार, मारगे मिनख रूकावै

रोकि रस्ता दुःख दीजै, दुनी इण पर भीड़िये

खबर हीणा खलक खोसै, पूर परजा पीड़िये

दीवाण दाद पावही, कूक दुनियां यों कह

दाणी दुश्मन होय लागा, दाण दुनियां ऊं गह (८)

अनर न हीये दाण, झूज हुई जांभाणां

खल चढिया कर खीज, सूरां गही कबाणां

कबणि कर गहि संबह, तिण वार तागाला रहै

नीसरे तरवार तीखी, बाण सर गोली बहै

लिखे बिण क्यों लोह लागै, सार अंग सूरां सहै

विश्नोई पतिशाह प्रगट, दाण सें क्या नैं देवै (९)

मंगल रचियो राम, विधि सूं बेरी विसाई

मिलियो मिनख अनेक, जान जुगत सूं आई

जुगति जानी हुवा भेला, निज करम लाभै न्योतियो

रामटो रणखेत आयो, मोड़ मस्तक बंधियो

तखगिरि तिरे आरती, रची चंवरी चौहटै

खिंवै भाला मंडयो भारत, मंगल रचियो रामटै (१०)

साहो सजियो राम, रन मां विवाह रचायो

धन्य सूरो सिंह हाक, गह कर सार समाह्यो

समाहि सार संधार आयो, कटक दल कियो कड़ो

परणाय जसवंत पार पहुंतो, लिख्यो साहो सांकड़ो

जैसे जुगति सूं तेग बाही, देखि सुरतो ओलख्यो

इन्द्र भवन उछाह हूतो, रामइये साहो सज्यो (११)

बड साको संसार, षोड़ षड़न्तै कीयो

वास धवै सुत सूर, जग माहीं जस लीयो

लियो जस जिण जीव काजे, शुक्ल पक्ष काया कसी

मघा नक्षत्र वार मंगल, चैत सुदी एकादशी

सतरह सौ सइये समै, नर दाण काजै सिर दियो

मुक्ति पंहुतो कह 'केशो', संसार बड साको कियो (१२)