मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह178 / 157
जुमलै की साखी

जमै की तीसरी साखी

साधे मोमणे कियो छै इलोच, जुमलो रचावियो ।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

साखी साबण ज्ञान जल, सतगुरु सरवर तीर।

मन धोबी तन कापड़ो पावन होत सरीर॥

तरवर सरवर सन्तजन, चौथा बरसे मेह।

परमारथ रे कारणें, चारूं धारी देह॥

तरवर कबहुं ना फल भखे, नदी ना संचै नीर।

परमारथ रे कारणें सन्ते धार्यो सरीर॥

साधे मोमणे कियो छै इलोच, जुमलो रचावियो ।

इंण जुमलै पूजैली करोड़, गुरु फुरमाइयो।

दिल का दुसमण पाल, तौ जुल जुमलै आइयो।

मोमिणो मेल्हो मन की भ्रान्ति, कुफर चुकाइयो।

कोड़े पांचे गुरु प्रहलाद, मुखी कहाइयो।

कोड़े साते हरिचंद राव, आछो करण कमाइयो।

कोड़े नवे दहुठल राव, सुरग सिधाइयो।

इबकै बारे गुरु जंभेश्वर देव, कलि मां आइयो।

आयो गुरु लियो छै पिछाण, भलो हुवैलो भाइयो।

संमराथल लियो मेल्हाणं, तखत रचाइयो।

कुपात्र सूं अलगा टाल, सुपह बतावियो।

शास्त्र वेद विचार, उत्तम पंथ चलावियो।

गुरु म्हारो बैठो खेवट ताण, अबूझ बुझाइयो।

गुरु म्हारै फेरयो सांभल ग्यान, सुपह बताइयो।

गुरु म्हारे अमलां रा मलिया मांण, अनुं नवाइयो।

पहलादा सूं किया कोल, बाचा पालण आइयो।

देवजी जांहरा सारैलो काज, जे गुरु जंभ धियाइयो।

जे ध्यायो जंभेश्वर देव, तां फल पाइयो।